You are currently viewing पिंजरा

पिंजरा

पिंजरा

चिड़िया को सुकून से दाना चुगते देख मन में ख्याल आया कि क्या मजे की इनकी जिंदगी है-न खाने की चिंता, न कुछ और । प्यारी सी चहचहाहट से सबके दिल को मोह लेना।  काश मैं भी चिड़िया जैसी होती।  इंसान की जिंदगी में इतनी आजमाइश क्यों? हर वक्त किसी न किसी तरह से समझौता। यह सब सोचते सोचते देर तक जागती रह गई।  देर रात तक नींद नहीं आई । सुबह जब उठी तो देखा घर में कोई नहीं है । सब अपने अपने काम पर चले गए थे। सिर में हल्का सा दर्द हो रहा था सोचा चाय पी लेती हूँ ।  रसोई में जा ही रही थी कि पड़ोस से आवाज आई “भाभी जी, ज़रा आइए ना”-पड़ोस की मेड की आवाज़ थी। मैंने कहा “चाय लेकर आती हूं”।  चाय बनाते बनाते पड़ोस वाले भाईसाहब के बारे में सोचने लगी। अकेला इंसान, एक रिटायर्ड प्रिंसिपल। बीवी कैंसर से पीड़ित थी छः साल पहले गुजर गई। खाना पकाने एक मेड आती है। दोनों वक़्त का खाना एक बार बना कर चली जाती है वो। भाईसाहब मोटापे के कारण ज्यादा चल नहीं सकते थे। मैं ख़यालों में खोई हुई थी कि फिर पड़ोस से आवाज आई-“ भाभी जी!!!” मैंने फटाफट चाय बनाई और लेकर भाईसाहब के घर पहुंच गई। घंटी बजाई तो अंदर से आवाज आई “दरवाजा खुला है आ जाइए”। अंदर पहुंची और पूछा “क्या हुआ भाई साहब”, उन्होंने कहा “तबीयत ठीक नहीं है”। चाय का कप देते हुए मैंने पूछा “चिंटू दिखाई नहीं दे रहा है? कहां गया आपका नाती”।फिर खयाल आया वह तो कैंप में गया होगा। चाय की चुस्की लेते हुए पूछा “कुछ परेशान हैं आप? कुछ हुआ है क्या?” इतना सुनते ही भाईसाहब छोटे बच्चे की तरह रोने लगे। मैं घबरा गई, मन में आशंकाओं ने घेर लिया। डरते हुए मैंने पूछा “सब खैरियत तो है भाईसाहब? चिंटू ठीक है ना?” रोते हुए वे बोले-“वो चला गया”। मैंने घबराकर पूछा “कहां?” उन्होंने कहा “अपनी मां के पास”। मैंने मन में सोचा- हां! तो गलत क्या है, बच्चे को भी तो मां चाहिए। लेकिन फिर उन्हें यू रोता देख मन में उनके प्रति दया भी आई। बोली “चाय पी लीजिए,वह आ जाएगा” । इतने में वह बोले,”भाभी जी वो मेरा जीने का सहारा था”। आंखों में आंसू थमने के नाम नहीं ले रहे थे। रोते हुए बोले, “भाभी जी मेरी एक ही बेटी है-खूब पढ़ी लिखी । पति से नहीं बनने के कारण तलाक ले लिया। उसके बेटे की कस्टडी के लिए कितने ही पैसे लुटा दिया”। यह कहते हुए वह जोर जोर से रोने लगे । मैंने धीरे से पूछा,”फिर?” । उन्होंने कहा,”फिर क्या भाभी जी, मैंने अपनी बेटी से कहा था-उसे अपने बेटे की चिंता नहीं करना है ।उसके बेटे को मैं पाल लूंगा । सब सही चल रहा था कि एक दिन वह घर से चली गई । अपने बेटे को मेरे पास छोड़ कर। सोशल नेटवर्किंग साइट पर किसी लड़के के संपर्क में आई थी और उसी के साथ चली गई । तब उसका बेटा चार साल का था । तब से  नाती को पाल रहा हूं, लेकिन आज वह भी मुझे छोड़ गया । मुझे अकेला करके अपनी मां के पास चला गया । अब कोई स्वार्थ नहीं रहा” । यह बोलते हुए भाईसाहब रोने लगे । उनके दर्द में मैं कब शामिल हो गई पता ही नहीं चला । मेरी आंखों से भी आंसू बहने लगे । मुझे वक्त का एहसास ही नहीं रहा । उनके आंसू से भीगे चेहरे पर जब नजर डाली तो लगा जैसे मन के पिंजरे में कैद दर्द को उन्होंने रिहा कर दिया है । शायद उनका दर्द, मुझे बोलने से- मुझे बताने से,कम हुआ होगा । भारी मन से मैं वहां से लौट आई । लेकिन ये विचार मुझे विचलित करने लगा- ‘कब तक  हम ऐसी भावनाओं के पिंजरे में कैद रहेंगे । कब तक ऐसे स्वार्थी रिश्तो के जाल में फंस कर हम खुद को लुटवाते रहेंगे । क्या इस दुनिया में इंसान सिर्फ अपने स्वार्थ तक ही मतलब रखता है?’ मन घबरा उठा इस अदृश्य पिंजरे से । 

 

चित्रांकन व रेखांकन : नन्दिनी सारंगी


pic credit: https://pixabay.com/

अपनों के साथ शेयर करें

This Post Has 8 Comments

  1. Rashi

    Bahut hi sunder rachna ki hai

  2. Rashi

    Bahut hi pyari aur hakikat se bhari rachna hai

  3. Vandana Ratre

    Nice one , loved the title

  4. sunil

    true

  5. Jaya shukla

    Inspirable….. Mam you are multi-talented… Superb one…

  6. Sumi srivastava

    Heart touching story

Comments are closed.